Allama Iqbal Shayari sirf alfaazon ka majmua nahi hai, balki ek soch, ek paighaam aur ek revolution hai. Allama Iqbal ne apni shayari ke zariye Musalmanon aur naujawanon ko apni khudi pehchanne ka dars diya. hindi shayari Unki shayari me khwab bhi hain, amal bhi aur khud par yakeen bhi.
Aaj ke modern time me bhi Allama Iqbal Shayari utni hi relevant hai jitni apne daur me thi.
1.
ख़ुदी को कर बुलंद इतना कि हर तक़दीर से पहले
ख़ुदा बंदे से ख़ुद पूछे, बता तेरी रज़ा क्या है
2.
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं
अभी इश्क़ के इम्तिहान और भी हैं
3.
नहीं तेरा नशेमन क़स्र-ए-सुल्तानी के गुम्बद पर
तू शाहीन है, बसेरा कर पहाड़ों की चट्टानों में
4.
अमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी, जहन्नम भी
यह ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी है
5.
गुज़र जा अक़्ल से आगे कि ये नूर
चराग़-ए-राह है, मंज़िल नहीं है
6.
कभी ऐ हक़ीक़त-ए-मुन्तज़र, नज़र आ लिबास-ए-मजाज़ में
कि हज़ारों सज्दे तड़प रहे हैं मेरी जबीन-ए-नियाज़ में
7.
उठो मेरी दुनिया के ग़रीबों को जगा दो
काख़-ए-उमरा के दर-ओ-दीवार हिला दो
8.
न थी हाल की जब हमें ख़बर, रहे देखते और गुज़र गए
वो ज़मीन थी मिरी राहगुज़र, वो आसमान था, सो उतर गया
9.
यक़ीं मुहकम, अमल पैहम, मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलम
जहाद-ए-ज़िंदा दिलों में हैं ये मर्दों की शमशीरें
10.
तू शब को भी पहचान, तू दिन को भी पहचान
गर दिल में है तूफ़ान तो दरिया भी नहीं रोकता
11.
फ़क़ीर-ए-राह हूँ, कोई तमन्ना नहीं मुझे
तू मिल गया तो ख़ुदा से भी शिकवा न रहेगा
12.
निगाहें बुलंद, सुख़न दिलनवाज़, जान पुरसोज़
यही है रुख़-ए-रहबर, यही है राज़-ए-कामयाबी
Conclusion
Allama Iqbal Shayari sirf padhi nahi jaati, balki mehsoos ki jaati hai. Yeh shayari insaan ko uski khudi se milati hai aur use halaat se upar uthne ka hausla deti hai. Aaj ke daur mein bhi Allama Iqbal Shayari humein yeh batati hai ki soch, amal aur yaqeen se hi asli badlav aata hai.
Agar aap prerna, atmvishwas aur zindagi ka maqsad talash rahe hain, to Allama Iqbal Shayari aapke liye ek roshan raasta hai.
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